भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने इस साल मई 2026 से लेकर 4 जून 2026 तक तीन पत्रकार वार्ताएं कीं और हर बार कहा कि इस साल देश में दक्षिण पश्चिम मानसून के दौरान बारिश सामान्य से कम रहेगी। मौसम विभाग के मुताबिक इस साल लंबी अवधि के औसत का लगभग 90 फीसदी बारिश कम होने का भी अनुमान है। कहने का मतलब इस साल बाकी सालों के मुकाबले मानसून कमजोर रहेगा। साथ ही मौसम विभाग ने इस बात की भी आशंका जतायी है कि इस साल मौसमी परिस्थितियांे के कारण कुछ क्षेत्रों में सामान्य से काफी कम बारिश होगी यानी यहां सूखे जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं। वास्तव में यह अल नीनो इफेक्ट के कारण होगा। इस तरह जहां ईरान-अमेरिका-इजरायल जंग के कारण पहले से ही महंगाई आम आदमी को परेशान कर रही है और शेयर बाजार किसी अपशगुन की हर दिन पहले से ज्यादा टूट रहे हैं, उसी सबके बीच किसानों के लिए किसी आपदा से कम नहीं है 2026 का कमजोर मानसून।
हम सब जानते हैं भारत में किसान और मानसून का रिश्ता केवल मौसम का नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा का भी रिश्ता है। इसलिए जब भारतीय मौसम विभाग मई के अंत में आयोजित अपनी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कह रहा था कि मानसून इस साल सामान्य से कम रहेगा, तो लाखों-करोड़ों किसानों के दिल में क्या बीत रही थी, इसे वह व्यक्ति नहीं समझ सकता, जो भारत में मानसून और किसानों के रिश्ते से परिचित न हो। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव डॉ. एम रामचंद्रन के मुताबिक हाल के 11 सालों में इस साल का मानसून सबसे कमजोर साबित हो सकता है, जिसकी वजह होगी
अल नीनो। भारत में आज भी 60 फीसदी से ज्यादा खेती प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौरपर वर्षा पर ही निर्भर है। ऐसे में कमजोर मानसून का अर्थ केवल कमजोर बारिशभर नहीं है बल्कि बुआई में देरी, उत्पादन में गिरावट, सिंचाई मंे संकट और किसानों की आय में होने वाली कमाई के कम होने से भी इसका रिश्ता है। भारत में सालभर की कुल वर्षा का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा जून से सितंबर के बीच होने वाले मानसून की वर्षा से हासिल होता है।
वास्तव में यही पानी हमारे जलाशयों, नदियों, भू-जल स्रोतों और खेतों को जीवन देता है। ऐसे में यदि इस दौरान मानसून कमजोर होता है, तो उसका सीधा असर खरीफ की फसलों जैसे- धान, सोयाबीन, कपास, मक्का, अरहर, उड़द और मूंग पर तो पड़ता ही है। इस दौरान की कम बारिश का असर रबी की फसल पर भी विशेषकर गेहूं की बुआई के लिए जमीन मंे जितनी नमी की जरूरत होती है, उसमें भी पड़ता है। ऐसे में भारतीय मौसम विभाग ने साफ संकेत दे दिया है कि इस साल जून से सितंबर के बीच कम बारिश के कारण हमारी दोनो ही फसलों के उत्पादन पर असर पड़ सकता है। हालांकि मानसून 4 जून 2026 को बिना किसी अतिरिक्त देरी के केरल पहुंच गया है। लेकिन सामान्य तौरपर यह 26 या 27 मई को पहुंच जाता है। लेकिन कई बार एक हफ्ते देरी से भी पहुंचता है। लेकिन जब अल नीनो की यह आशंका नहीं रहती, तो यह देरी मायने नहीं रखती। मगर चूंकि इस साल अल नीनो के 80 फीसदी से ज्यादा प्रभाव पड़ने की आशंका है, इसलिए इस एक सप्ताह की देरी के मायने हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैसे तो 90 प्रतिशत बारिश का मात्रा के रूप में बहुत कम होना नहीं होता। क्योंकि जब सामान्य बारिश होती है, तो वह 100 से 104 फीसदी तक होती है और जब सामान्य से ज्यादा होती है, तो उसका 100 से 112 या 115 फीसदी तक होती है। इस प्रतिशत में कम या ज्यादा बारिश के महत्व को नहीं समझा जा सकता। क्योंकि भारत में जितनी बारिश होती है, उसमें से करीब 85 से 89 फीसदी पानी बारिश के दौरान ही बहकर समुद्र में पहुंच जाता है।
ऐसे में इसके बहुत मायने नहीं है कि बारिश 90 फीसदी हुई या 104 फीसदी। असली बात ये है कि जब कम बारिश होती है, तो बारिश की अवधि छोटी हो जाती है और भारतीय कृषि के लिए बारिश की यह अवधि अत्यंत मायने रखती है। एक और महत्वपूर्ण बात है, भारत की कुल बारिश आमतौर पर 10 से 12 फीसदी कम या 4 से 10 फीसदी ज्यादा होती है। ऐसे में इस कमी का जल की मात्रात्मक दृष्टि से बहुत मतलब नहीं होता। लेकिन जब हम कहते हैं कि बारिश 4 से 10 फीसदी या 4 से 15 फीसदी कम होगी, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हर जगह बारिश कम होगी। इसका मतलब यह है कि किसी जगह बहुत कम होगी और किसी जगह सामान्य या सामान्य से कुछ ज्यादा होगी। अतः मानसून में बारिश का आसमान वितरण बहुत मायने रखता है और चूंकि इस साल अल नीनो का खतरा मंडरा रहा है, इसलिए यह 10 से 14 फीसदी तक कम बारिश बहुत खतरनाक हो सकती है।
दरअसल अल नीनो प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में होने वाली असामान्य वृद्धि को कहते हैं। इसका प्रभाव पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। भारत मंे अल नीनो का प्रभाव कमजोर मानसून के रूप में देखा जाता है। जब प्रशांत महासागर के पानी का तापमान बढ़ जाता है तो भारत में सूखे जैसे हालात बन जाते हैं। क्योंकि मानसून कमजोर हो जाता है और सबसे बड़ी बात यह है कि कहीं कम और कहीं काफी ज्यादा कम हो जाता है। 1982, 1997 और 2015 में अल नीनो ने भारतीय मौसम को प्रभावित किया था। मौसम विभाग का अनुमान है कि जून-जुलाई में अल नीनो विकसित हो सकता है। इस वजह से मानसून के दूसरे हिस्से में इसका प्रभाव बढ़ सकता है। कहने का मतलब जुलाई और अगस्त की वर्षा को लेकर हमारे किसानों को इस साल खास तौरपर सतर्क रहना होगा। यह वही मौसम होता है जब धान बढ़ रहा होता है, इसमें बालें निकलने को हो रही होती हैं और बालों मंे दाने बन रहे होते हैं। अगर उस मौसम में मानसून कमजोर रहा तो अनुमान है कि देश में धान की फसल 10 से 20 फीसदी तक कम हो सकती है। चूंकि देश में धान की खपत कई क्षेत्रों में गेहूं से ज्यादा है और सम्पूर्णता में देखें तो भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में चावल, रोटी से ज्यादा खाया जाता है। इसका मतलब यह है कि अगर धान की पैदावार 15 से 20 फीसदी कम होती है, तो देश में किसानों की आय पर तो बुरा असर पड़ेगा ही, आम लोगों के रोजमर्रा के बजट में भी 10 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हो जायेगी, जो बहुत त्रासद होगी।
ऐसे में किसानों को जुलाई और अगस्त के दौरान खास तौरपर सतर्क रहना होगा। क्योंकि पहले से इसके अनुमान हैं, इसलिए सरकार को भी इस दौरान धान उत्पादन क्षेत्रों मंे नहरों के जरिये ज्यादा से ज्यादा पानी उपलब्ध कराये जाने की व्यवस्था करनी होगी। लेकिन संकट ये है कि देश में नहरों का जाल बहुत सीमित है और वह भी उत्तर भारत में ही है। इसलिए इसके धान की खेती को बहुत ज्यादा फायदा नहीं हो सकता। हमें धान की खेती सुरक्षित करने के लिए जुलाई-अगस्त के महीनों मंे किसानों की मदद के लिए पानी का प्राकृतिक रूप से संचय करने और धान के खेतों तक पहुंचाने की व्यापक व्यवस्था के बारे में सोचना होगा। सवाल है कि किसान इस समस्या से कैसे निपट सकते हैं? क्योंकि मानसून कमजोर होने की असली पीड़ा तो उन्हीं को भुगतनी होगी। विशेषज्ञ कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षाें के अनुभव हमें बताते हैं कि अगर समय रहते रणनीति बदल ली जाए तो खेती में होने वाले नुकसान को काफी कम किया जा सकता है। देश में अब भी ऐसी दर्जनों धान की प्रजातियां हैं, जो कम पानी में भी पैदा हो जाती हैं, बस संकट ये होता है कि उनका उत्पादन उन प्रजातियों के मुकाबले कम होता है, जिन्हें ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है। अब चूंकि कम बारिश की आशंका वैज्ञानिकों को लग रही है, इसलिए सरकार को चाहिए कि वह स्थानीय स्तर पर किसानों को मानसिक तौरपर इस बात के लिए तैयार करे कि इस साल खराब मानसून की आशंका को देखते हुए कम पानी वाली धान की फसलों और कई जगहों पर बिना धान की दूसरी खरीफ की फसलों को उगाने की कोशिश होना चाहिए। इससे किसानों को होने वाले नुकसान में काफी कमी हो सकती है।
जिन क्षेत्रों मंे सिंचाई की सुविधा है, वहां बेशक किसान ज्यादा पानी वाली धान की प्रजातियां लगा सकते हैं, लेकिन जहां जुलाई के उत्तरार्ध और अगस्त में पानी की कमी की आशंका है, वहां ज्वार, बाजरा, अरहर, मूंग और तिल की फसलें बेहतर विकल्प हो सकती हैं। इसलिए मौसम की भविष्यवाणी कर सकने की क्षमता का अगर हम किसानों के नुकसान को कम करने में करें तो इस साल धान के बजाय इन कम पानी वाली फसलों पर किसानों को राजी कराकर इस आपदा का मुकाबला कर सकते हैं।
लेकिन इसके लिए सरकार को युद्धस्तर पर हर जिले और ब्लॉक के स्तर पर किसानों के साथ यह जानकारी साझा करनी होगी कि अल नीनो का असर कई तरह से सामने आ सकता है। हो सकता है जून के शुरु में बारिश की शुरुआत हो जाए और फिर एक लंबा दौर सूखे का गुजरे। ऐसे में खेती जोखिमभरी हो सकती है। कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों को ऐसी समस्याओं को ध्यान में रखकर नई तरह की फसलों और किस्मों को उगाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना होगा। तभी खेती को विज्ञान की जानकारियों से फायदा हो सकता है।
हम सब यह भी जानते हैं कि कम से कम मानसून के दौरान भी देश में इतना पानी बरसता है कि अगर सही से उसका उपयोग कर लिया जाए तो भारत में खेती में संकट न हो। लेकिन इसके लिए कुछ बुनियादी काम करने होंगे। खेतों मंे नमी बनी रहे, इसके लिए मेड़बंदी, मल्चिंग, शून्य जुताई और वर्षा जल संचय जैसी तकनीकों को काम मंे लाना होगा। इसे आसान तरीके से यूं समझें कि बारिश के दिनों मंे हमारे खेतों की चारो तरफ से मजबूत मेड़बंदी हो, जो बारिश का पानी हमारे खेतों मंे गिरे वह लंबे समय तक खेतों में खड़ा रहे, जिससे गहरे तक नमी धंस जायेगी और खरीफ के बाद रबी की फसल के लिए यह नमी बहुत फायदेमंद साबित होगी। लेकिन ऐसा हो इसके लिए देश के किसानों को जागरुक करना होगा। उत्तर भारत में गेहूं कटने के बाद ज्यादातर खेतों की मेड़बंदी ढही पड़ी होती है। इसलिए बारिश होते ही सारा पानी खेत से बाहर निकल जाता है। हमें किसानों को यह समझना होगा कि अच्छी खेती के लिए बारिश के पानी को खेतों में लंबे समय तक रोका जाना जरूरी है। यही नहीं बारिश से निपटने का एक तात्कालिक उपाय यह भी हो सकता है कि किसान अपने खेतों के बीच एक 10x20x10 का गड्ढा बनाएं और उसमें बारिश के पानी को इकट्ठा कर लें। इस तरह यह एक गड्ढा आसपास के कई एकड़ खेती के लिए भरपूर पानी उपलब्ध करा सकता है और गड्ढे का यह हिस्सा भी अनुत्पादक न साबित हो, इसके लिए इसमें मछली पालन या कई जलीय फसलें जैसे सिघाड़ा, कमल तथा और ऐसी ही और भी कई फसलें हैं जो पैदा की जा सकती हैं और जमीन का दोहरा लाभ लिया जा सकता है।
कुल मिलाकर हालांकि इस साल मौसम की मार और अल नीनो का प्रभाव खेती और किसानों को डरा रहा है। लेकिन अगर सजगता से इस स्थिति के लिए पहले से तैयारी करके मुकाबला किया जाए तो होने वाले आकस्मिक नुकसान से न सिर्फ बचा जा सकता है बल्कि आय भी बेहतर की जा सकती है।
एक नजर : कमजोर मानसून 2026
(लेखक विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान, इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में वरिष्ठ संपादक हैं)